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Showing posts from January, 2021

Jawab-e-Shikwa ‎(Bang-e-Dra-120) ‏Poetry/Shayari by Allama Muhammad Iqbal‎

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दिल से जो बात निकलती है असर रखती है  पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है  क़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती है  ख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती है  इश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिरा  आसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरा  पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई  बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई  चाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोई  कहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोई  कुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझा  मुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझा  थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या  अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या  ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या  आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या  ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं  शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं  इस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम है  था जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम है  आलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम है  हाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम है  नाज़ है...

वाह क्या मर्तबा ऐ ग़ौस है बाला तेरा ‎- ‏Imam ahle sunnat, ‏mujaddid e deen o millat, ‏ash shah Imam Ahmed Raza Khan ‎( علیہ الرحمہ )‏

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वाह क्या मर्तबा ऐ ग़ौस है बाला तेरा ऊंचे ऊंचों के सरों से क़दम आ’ला तेरा सर भला क्या कोई जाने कि है कैसा तेरा औलिया मलते हैं आंखें वोह है तल्वा तेरा क्या दबे जिस पे ह़िमायत का हो पन्जा तेरा शेर को ख़त़रे में लाता नहीं कुत्ता तेरा तू ह़ुसैनी ह़-सनी क्यूं न मुह़िय्युद्दीं हो ऐ ख़िज़र मज्मए़ बह़्‌रैन है चश्मा तेरा क़समें दे दे के खिलाता है पिलाता है तुझे प्यारा अल्लाह तेरा चाहने वाला तेरा मुस्त़फ़ा के तने बे साया का साया देखा जिस ने देखा मेरी जां जल्वए ज़ैबा तेरा   इब्ने ज़हरा को मुबारक हो अ़रूसे क़ुदरत क़ादिरी पाएं तसद्दुक मेरे दूल्हा तेरा क्यूं न क़ासिम हो कि तू इब्ने अबिल क़ासिम है क्यूं न क़ादिर हो कि मुख़्तार है बाबा तेरा न-बवी मींह अ़-लवी फ़स्ल बतूली गुलशन ह़-सनी फूल ह़ुसैनी है महक्ना तेरा न-बवी ज़िल अ़-लवी बुर्ज बतूली मन्ज़िल ह़-सनी चांद ह़ुसैनी है उजाला तेरा न-बवी ख़ुर अ़-लवी कोह बतूली मा’दिन ह़-सनी ला’ल ह़ुसैनी है तजल्ला तेरा बह़्‌रो बर शहरो क़ुरा सहलो ह़ुज़ुन दश्तो चमन कौन से चक पे पहुंचता नहीं दा’वा तेरा ह़ुस्ने निय्यत हो ख़त़ा फिर कभी करता ही नहीं आज़्माया है यगाना है दोगाना तेरा अ...

Mujh Pe Bhi Chashme Karam Aye Mere Aaqa Karna - Pir Naseer ud din Naseer

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Mujh Pe Bhi Chashme Karam Aye Mere Aaqa Karna Haq Toh Mera Bhi Hai Rehmat Ka Takaaza Karna Tu Kisi Ko Uthata Nahi Apne Dar Se Ke Teri Shaan Ke Shaaya Nahi Aisa Karna Mai Hu Bekas Ke Tera Shewa Hai Sahara Dena Mai Hu Beemaar Tera Kaam Hai Achcha Karna Mai Ke Zarra Hu Mujhe Wusate Sahara Dede Ke Tere Bas Me Hai Katre Ko Bhi Darya Karna Yeh Tera Kaam Hai Aye Aamina Ke Durr e Yateem Saari Ummat Ki Shafa’at Tane Tanha Karna Chaand Ki Tarha Tere Gird Woh Taaro Ka Hujoom Woh Tera Halqaye Ashaab Me Baitha Karna Mujh Pe Mehshar Me Naseer Unki Nazar Padh Hi Gayi Kehne Waale Isse Kehte Hai Khuda Karna اَللّٰھُمَّ اجۡعَلۡنیۡ مِنَ التَّوَّابِیۡنَ وَاجۡعَلۡنِیۡ مِنَ الۡمُتَطَہِّرِیۡنَ Mujh Pe Bhi Chashme Karam Aye Mere Aaqa Karna - Pir Naseer ud din Naseer   Syed Farhan Ali Qadri #Tundav ❤️ आपको अगर कोई सवाल है तो जरूर कमैंट्स में हमें बताईये - अगर वीडियो अच्छा लगा तोह लिखे और सब्सक्राइब जरूर कीजियेगा |  Jazāk Allāhu Khayran - جَزَاكَ ٱللَّٰهُ خَيْرًا

इस्लाम अली हैं मेरा ईमान अली हैं - Huzur Ghazi E Millat Allama Syed Hashmi Miyan Ashrafi Al Jilani

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ख़ामोश है तो लगता है के क़ुरआन अली हैं गर बोलें तो लगता है के क़ुरआन अली हैं क़ुरआन तो देता है हमें दावते ईमान ईमान ये कहता है मेरी जान अली हैं उम्मत में नुमाया है सभी अहले विलादत और अशहाबे विलादत के भी सुल्तान अली हैं इस बाग ए नबुवत की कली फातिमा जहरा हसनैन है दो फूल तो गुलज़ार अली हैं ये उम्मत ए सरकार मिटी है ना मिटेगी इस आखिरी उम्मत के निगेहबान अली हैं वो मौका ए हीजरत हो या के जंग ए ओहद हो हर हाल में सरकार पर कुर्बान अली हैं खैबर का किला चीख के देता है गवाही कुछ शक नहीं कुव्वत ए याजदां अली हैं है मदद ए मुक़ाबल को भी पीने की इजाज़त सफिंक मौके पे ज़ीशान अली हैं मैं समा शबिस्ता ए विलायत कहुं किसको ? दिल बोल उठा शबिस्ता ए विलायत अली हैं हर एक यजीदी से कहो हाशमी खुल कर इस्लाम अली हैं मेरा ईमान अली हैं कलाम ए हुज़ूर गाज़ी ए मिल्लत हज़रत सय्यद हाशमी मिया अशरफी जिलानी सज्जादानशीन अस्ताना ए मोहद्दिस ए आज़म ए हिन्द