Jawab-e-Shikwa (Bang-e-Dra-120) Poetry/Shayari by Allama Muhammad Iqbal
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है क़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती है ख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती है इश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिरा आसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरा पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई चाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोई कहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोई कुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझा मुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझा थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं इस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम है था जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम है आलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम है हाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम है नाज़ है...